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Wednesday, August 29, 2012

एक पालतू मिटठू की कहानी



एक थी मादा तोता   ,हरे पखों और लाल चोंच वाली  |वह पिंजरे मे रहती थी
और उसे  अपना घर समझती  थी |उसे पेड़ की कोटर से निकाल कर इस पिंजरे तक
कौन लाया, इसका तो किसी को सही सही पता नहीं | सब उसे मिटठू के नाम से
पुकारते थे |उसका पिंजरा दिन भर घर के दरवाजे के एन ऊपर टंगा रहता और
उसमें बैठी वह मिटठू - मिटठू की रटन्त लगाये रहती |सब उसे प्यार करते,
दुलारते और खाने के कभी फल ,हरी मिर्च तो कभी पूड़ी कचौड़ी मिष्ठान देते
|
वह  मगन होकर खाती  और मस्त रहती  |उसकी जिंदगी उस पिंजरे में मज़े से
गुज़र रही थी |
तभी हुआ यह कि उस तोती  के मालिक को जाने क्या सूझी उसने  कि तोते   का
नाम मिटठू से बदल कर अभिव्यक्ति रख दिया  |तोते  का मालिक खुद को
विप्लवी  लेखक समझता था  |उसके मित्र  छपास रोगी लेखक   थे  |उन्होंने घन्टों
 
तोता विमर्श  के बाद  अभिव्यक्ति का पिंजरा  खोल दिया  |उनका मानना था कि अभिव्यक्ति
उन्मुक्त होगी  तभी तो आकाश की ऊंचाईयों को छू पायेगी |वे अपने इस
कारनामे पर इतना मुदित हुए कि उन्होंने  एक सेकंड  में एक की दर से
हजारों  हाईकू व लघुकथाएँ रच डालीं | वे  साहित्य सृजन में डूबे रहे और
अभिव्यक्ति सोचती रही कि वह पिंजरे से बाहर जाये तो जाये कहाँ |
पिंजरा खुला रहा और वह सोचती रही | उसने व्यथित होकर पुकारा मिटठू
-
मिटठू तो  मालिक ने उसे तुरन्त डपट दिया मिटठू नहीं ,अभिव्यक्ति बोल
|
अब तेरा यही नाम है |आखिरकार हार -थक कर अभिव्यक्ति अपने पिंजरे से बाहर
निकली |उसने पंख फडफडाये और आकाश में उड़ना चाहा |वह कुछ ही उड़ सकी और फिर
घर के बाहर लगे पेड़ पर जा बैठी |उसने मिटठू मिटठू की टेर  लगाई कि कोई तो
उसकी विपदा समझेगा | उसे पिंजरे में वापस पहुंचा देगा  |
पेड़ की  फुनगी पर बैठी उदास अभिव्यक्ति हमेशा  पिंजरे में वापस आने को
आतुर रहती  है |उसे पिंजरे से बाहर  खतरे  ही खतरे  दिखते हैं |कभी
बिल्ली से , कभी बाज़ से और कभी गली के शैतान बच्चों की गुलेल  से बचना
पड़ता है | भोजन  के लिए पूरी जद्दोजेहद करनी  है ,फिर भी वैसे मालपुए
कहाँ मिल पाते हैं जैसे पहले मिलते थे  बैठे ठाले  |उसने पिंजरे के बाहर
जैसे -तैसे जीना तो सीख लिया है पर उसे  कष्ट बहुत हैं |
एक दिन उसे अपना पुराना मालिक मिला तो उसने कहा -आपने मुझे अभिव्यक्ति
बना कर  मुसीबत मे डाल  दिया |मुझे वापस घर ले चलो | मालिक ने कहा
अब तुझे कौन रखेगा घर में |मैंने सुना है कि तू अब गंदी गंदी गलियां
देना सीख गयी है |सबका  मखौल उड़ाती है |अफवाहें फैलाती है | खरी खरी
कहती है |कभी बेहया ट्विटर  तो कभी किताबी चेहरे वाले खटरागियों  की
संगत में दिखती है |मैंने  सुना  है कि तू आवारा तोतों को देख कर सीटी भी
बजाती है |मैं ठहरा बाल बच्चों वाला संस्कारवान लेखक तुझे अपने घर में रख
कर  मुझे समाज में अपनी थू थू नहीं करवानी |तू जहाँ है ,वहीं रह |
अभिव्यक्ति को पिंजरे से मुक्त  हुए अरसा हुआ पर उसे अपने  सपनों में
पिंजरा अभी भी दिख जाता  है |उसने पिंजरे वापस पाने किस -किस से गुहार
नहीं की पर  किसी ने न सुनी | किसी राजा ,सामंत ,दलाल ,साहूकार या
धन्नासेठ का  नरमदिल   पसीजेगा तब इसका   स्वप्न साकार होगा |इनको पालतू
मिटठू ही  भाते हैं |


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